कुछ अनकहे अनसुने शब्द भाग -11)

                   ( भाग - 11 )

बहुत लम्बे समय तक ऑपरेशन चलने के बाद डॉक्टर साहब बाहर आते है। और शास्त्री जी को बताते हैं। कि ऑपरेशन सफल रहा है। अब बहुत जल्द आपकी बेटी बोल पाएंगी। थोड़ा समय लगेगा पर अब वह बोल सकती हैं। ये बात सुनकर प्रियंवदा का भाई, माॅं और शास्त्री तीनों बहुत खुश जाते हैं। कुछ देर बाद प्रियंवदा को सामान्य कक्ष में लाया जाता है। और बहुत देर बाद उसे होश आता है।  

 प्रियंवदा - (  इशारों में कहती हैं।) क्या हुआ ?

डॉक्टर साहब - ऑपरेशन सफल हुआ है। अब तुम बहुत जल्द बोलने लगोगी। लेकिन अभी कुछ दिन बोलने की कोशिश नहीं करनी है। कुछ दिन तुम यूॅं ही आराम करोगी। ठीक है। इसीलिए तुम्हारे परिवार वालों की आंखों में खुशी के आंसू हैं। वैसे बेटा एक बात बताओ अभी तुम कैसा महसूस कर रही हो। 

प्रियंवदा - (इशारों में ) मैं ठीक हूॅं।

डॉक्टर साहब - बहुत अच्छा। अब आप लोग मिल सकते प्रियंवदा से, मैं चलता हूॅं।

                 शास्त्री जी और प्रियंवदा की माॅं और भाई सब उससे मिलते हैं। और उसे प्यार करते हैं। प्रियंवदा भी बहुत खुश होती हैं। लेकिन उसकी नजरें कहीं ना कहीं प्रभात को देखना चाहती हैं। पर वो जानती थी कि प्रभात कुछ दिन बाद ही आएगा।

                   उधर प्रभात प्रियंवदा के ख्यालों में खोया सफर कर रहा होता है। सुबह से शाम हो जाती हैं, और प्रभात अपने घर से कुछ ही दूरी पर होता है। कि अचानक से एक घटना घटित हो जाती हैं। तभी सामने से आ रहा एक असंतुलित ट्रक विपरीत दिशा से आ दूसरे ट्रक से बड़ी जोर से टकराता है। और प्रभात की गाड़ी का चालक अपनी गाड़ी को दुर्घटना से बचाता हुआ मोड़ता हैं। कि उसकी गाड़ी एक पेड़ से जाकर टकराती हैं। दोनों को हल्की फुल्की कुछ चोट आती हैं। लेकिन जब दो ट्रक आपस में टकराते हैं। तो बहुत जोर का धमाका होता है। बहुत तेज टकराने की आवाज आती हैं। और उस वक़्त प्रभात की कार धमाके के सबसे नजदीक होती है। उस धमाके की आवाज से प्रभात और उस चालक के कानों में एक सीटी सी बजती हैं। और दोनों  बेहोश हो जाते हैं। तभी आस - पास के लोगों ने आकर उन्हें सबसे नजदीकी अस्पताल में भर्ती करवाया। और प्रभात की जेब से मिले पर्स और पते के आधार पर उसके परिवार वालों को सूचित किया।

                   प्रभात के एक्सिडेंट की खबर सुनकर उसका पूरा परिवार अस्पताल पहुॅंचता है। परिवार वालों के पहुॅंचते ही प्रभात को होश आ जाता हैं। वह आंखें खोलता है, तो अपने को अस्पताल में पाता है। सामने अपने परिवार को देख वह खुश हो जाता हैं। और अपनी माॅं के गले लगता हैं। उसकी माॅं प्रभात से कुछ पूछती हैं।

माॅं - प्रभात, बेटा ये सब कैसे हुआ ?

प्रभात - कुछ सुनाई नहीं दिया माॅं, आप क्या कह रही है ?

माॅं - (घबराते हुए फिर पूछती हैं ) मैंने कहा ये सब कैसे हुआ बेटा ?

प्रभात - ( फिर दोहराता हैं ) माॅं, माॅं मुझे कुछ नहीं सुनाई दे रहा है। (वह डॉक्टर की ओर देखकर कहता हैं ) डॉक्टर मुझे कुछ सुनाई क्यों नहीं दे रहा है ? मुझे क्या हुआ है ? बताओ डॉक्टर।

प्रभात की माॅं रोने लगती हैं। 

डॉक्टर - आप सब अभी बाहर इंतजार करें। मैं अभी जाॅंच करके आपको बताता हूॅं। वो क्या हुआ, ये अभी तक बेहोश थे, और बाहरी कोई चोट इन्हें नहीं आई है। ये बिल्कुल फिट हैं। वो हम इनके टेस्ट करके देख चुके हैं। अब जब इन्हें होश आ गया है। और ये सुन नहीं पा रहे हैं। तो हमें देखना होगा। अभी आप सब बाहर जाएं। मैं थोड़ी देर में आपको बताता हूॅं। क्या हुआ हैं।

वे सब बाहर चले जाते हैं। लेकिन प्रभात देख रहा होता है। कि सब आपस में कुछ ना कुछ बोल रहे हैं, पर मैं कुछ भी सुन नहीं रहा हूॅं। 

प्रभात - डॉक्टर जल्दी चैक करके बताइए, कि मुझे क्या हुआ हैं। मैं सुन क्यों नहीं पा रहा हूॅं ?

डॉक्टर - आप घबराइए मत मैं अभी बताता हूॅं।

डॉक्टर प्रभात को चैक करता हैं। फिर बाहर जाकर उसके परिजनों को बताता है, कि 

डॉक्टर - प्रभात की सुनने की शक्ति जा चुकी हैं। जब एक्सिडेंट हुआ तो शायद वहाॅं बहुत बड़ा धमाका हुआ, उस धमाके की आवाज से कानों पर असर पड़ा है। पर इस तरह के केस में अधिकांश कुछ समय बाद सुनने की शक्ति वापस आ जाती हैं। उसका इलाज हैं। आप लोग घबराए नहीं। मैं जल्द से जल्द किसी विशेषज्ञ से सलाह लेता हूॅं। और इलाज शुरू कर देते हैं। 

प्रभात का परिवार प्रभात से मिलने जाता हैं। 

प्रभात - माॅं क्या कहा डॉक्टर ने, क्या हुआ हैं मुझे ?

माॅं - कुछ नहीं बेटा। वो..

प्रभात - माॅं मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। जोर से कहो।

माॅं रोते हुए बाहर चली जाती हैं। तभी उसके पापा उसे एक कागज में सब लिखकर देते हैं। प्रभात पढ़ कर दुखी हो जाता है। और पापा के सीने से लगकर रोने लगता है। पापा उसे लिखकर देते हैं।

पापा - प्रभात बेटा रोता क्यों हैं। डॉक्टर कान के विशेषज्ञ को बुला रहे है। और अब वही आकर तुम्हारा इलाज करेंगे। तुम्हें कान के अंदर कोई गहरी चोट नहीं आई है। वो आवाज़ के प्रभाव से हुआ है। जो जल्द ही इलाज से ठीक हो जाएगा।

ये सुनकर प्रभात को तसल्ली मिलती हैं। थोड़ी देर बाद दूसरे डॉक्टर आते हैं, और प्रभात का चेकअप कर के प्रभात के पिता को बताते हैं कि 

डॉक्टर -  घबराने की कोई बात नहीं है। प्रभात कुछ ही समय में सुनने लगेगा। इन्हें समय - समय पर इलाज के लिए यहाॅं आना होगा। वैसे आप इन्हें घर ले जा सकते हैं। ये बिल्कुल तंदुरुस्त है।  

प्रभात के परिजन डॉक्टर को धन्यवाद कहते हुए, प्रभात को घर ले जाते हैं। घर जाते समय वह प्रियंवदा के बारे में जानना चाहता है। कि वह कैसी, उसका ऑपरेशन कैसा हुआ। वह अपनी माॅं से कहता हैं कि

प्रभात - माॅं मैं शास्त्री जी से बात करना चाहता हूॅं। पर कैसे करूॅं, मैं कुछ भी सुन नहीं सकता।

माॅं - घर चलकर मैं बात करूॅंगी उनसे, तू घर तो चल पहले।
      घर में चारों ओर खुशी का माहौल होता है। सब इतने दिनों बाद प्रभात से मिलकर खुश होते हैं। प्रभात उन्हें अपने शोधकार्य के दौरान के कई रोचक किस्से सुनाता हैं। अपनी और प्रियंवदा की प्रेम कहानी बताता है। और प्रियंवदा से बात करने और उसकी तबीयत पूछने की इच्छा जाहिर करता है। तो प्रभात की माॅं अस्पताल में ( जहाॅं प्रियंवदा होती हैं ) वहाॅं फोन करके शास्त्री जी को फोन पर बुलवाती है।

माॅं - शास्त्री जी नमस्कार। मैं प्रभात की माॅं बात कर रही हूॅं।

शास्त्री जी - जी नमस्कार बहन जी। कैसे हैं आप सब और प्रभात घर सकुशल पहुॅंच गया।

माॅं - जी, शास्त्री जी। प्रभात घर आ गया है। आप बताइए प्रियंवदा कैसी है ? ऑपरेशन कैसा रहा है ?

शास्त्री जी - जी ईश्वर के आशीर्वाद से ऑपरेशन सफल रहा है। बस कुछ दिनों में वह बोलने लगेगी। जी प्रभात कहाॅं हैं, क्या उससे एक बार बात हो सकती है ? मैं खुद उसे ये खुशखबरी देना चाहता हूॅं। यदि आप कहें तो।

माॅं - वो क्या हैं ना शास्त्री जी, प्रभात मेरे ही पास बैठा है। पर अभी मैं बात नहीं करा सकती। क्योंकि पहले मुझे आपको कुछ बताना हैं। लेकिन प्रभात कह रहा है कि आप प्रियंवदा को इस बारे में कुछ नहीं बताएंगे।

शास्त्री जी - ( घबराते हुए ) बताए तो सही, प्रभात ठीक तो हैं ना।

माॅं - ईश्वर के आशीर्वाद से प्रभात बिल्कुल ठीक है। पर प्रभात का आते समय एक छोटा - सा एक्सिडेंट हो गया है। जिसमें उसे वैसे तो कोई चोट नहीं आई है। पर वो सुन नहीं सकता है। 

शास्त्री जी - हे भगवान यह क्या हो गया। कैसे हो गया ?

तब प्रभात की माॅं उन्हें सारी बात बताती हैं। शास्त्री जी सुनकर दुखी हो जाते हैं। तो प्रभात की माॅं उन्हें बताते हुए कहती हैं। कि

माॅं - शास्त्री जी घबराने की बात नहीं है। डॉक्टर ने कहा हैं। कि इलाज संभव है। और कुछ ही समय बाद प्रभात फिर से सुन सकेगा।

शास्त्री जी - काश कि मैं प्रभात से मिलने आ पाता। मैंने हमेशा प्रभात को अपना बेटा कहा हैं। पर क्या करूॅं, अभी प्रियंवदा अस्पताल में ही हैं। आप प्रभात से कहिएगा कि प्रियंवदा को घर ले जाने के बाद मैं उससे मिलने जरूर आऊॅंगा।

माॅं - नहीं, नहीं शास्त्री जी आप यहाॅं ना आए। दरअसल हम ही बहुत जल्द प्रियंवदा से मिलने आ रहे हैं। बस आप ये बताइए कि आप सब घर कब जा रहे हैं ?

शास्त्री जी -  चार दिन बाद ही हम घर चले जाएंगे। आप सब आइए, आपका बहुत - बहुत स्वागत है। हम आपका इंतजार करेंगे। प्रभात को याद कीजिएगा।

माॅं - जी जरूर, शास्त्री जी मैं आपको बताना चाहती थी। कि हम प्रभात के लिए प्रियंवदा का हाथ माॅंगने आ रहे हैं। यदि आपको प्रभात की वर्तमान स्थिति से कोई ऐतराज ना हो तो। 

शास्त्री जी - कैसी बात कर रही हैं आप बहन जी। प्रभात ने तो मुझे प्रेम का मतलब बताया है। मैं तो पहले ही अपनी ना बोल सकने वाली लड़की के प्रति प्रभात के प्यार के सामने हार गया। मैं तो बहन जी इनके अनूठे, अद्भुत प्यार के आगे पहले ही नतमस्तक हो गया हूॅं। लेकिन फिर भी मैं चाहता हूॅं कि प्रभात के जीवन का निर्णय आप अपनी समझ से ले। आप पहले प्रियंवदा से मिले यदि आप पसंद करें तो मुझे खुशी होगी। मुझे तो प्रभात दामाद के रूप में बहुत पसंद है।

माॅं - यदि ऐसा है तो मैं हाथ माॅंगने नहीं, सीधे रिश्ता पक्का करने आती हूॅं। आप मेरी बहू की ये खुशखबरी सुना दे। पर शास्त्री जी प्रभात चाहता है कि उसके ना सुनने की बात अभी प्रियंवदा को ना बताएं। उसे दुख होगा। वो कहता हैं कि वह खुद ये बात प्रियंवदा को बताएगा।

शास्त्री जी - जैसी प्रभात की इच्छा, मैं उसका मान रखूॅंगा। 

             इसके बाद फोन रखकर शास्त्री जी वहीं प्रतीक्षा कक्ष में बैठ जाते हैं। तभी शास्त्री जी की पत्नी वहाॅं आती हैं। और पूछती हैं। शास्त्री जी उन्हें प्रभात के बारे में बताते हैं। जिसे सुनकर वह सामान्य रहते हुए मुस्कुराती हैं।
 
   प्रियंवदा की मां - भगवान ये कैसी परीक्षा ले रहे हैं इन दोनों के प्यार की। आप क्या सोच रहे हैं ?

शास्त्री जी - सोचना क्या हैं किस्मत से प्रभात जैसा लड़का मिलता हैं। वे लोग हमारे घर आने वाले हैं। रिश्ता पक्का करने,लेकिन प्रभात प्रियंवदा को खुद अपने बारे में बताना चाहता है। इसीलिए तुम भी कुछ नहीं बताना प्रियंवदा को। ठीक है।

प्रियंवदा की माॅं - ये तो खुशी की बात है। हम उनके स्वागत की तैयारी पूरी दिल से करेंगे। और रही बात प्रियंवदा को कुछ भी बताने की तो मैं उससे कुछ भी नहीं कहूॅंगी। अब चले प्रियंवदा के पास।

ऐसे ही कुछ दिन और बीत जाते हैं। उधर प्रभात पूरे दिल से और लगन से अपना इलाज करा रहा होता है, ताकि वह जल्द से जल्द ठीक हो जाएं। और जब  प्रियंवदा से मिले तो जो वह कहना चाहती हैं सुन सके। और उधर प्रियंवदा रोज प्रभात की राह तकती हैं। अब तो वह बोल सकती है। उसे प्रभात से अपने दिल की हर बात कहनी है। पर शास्त्री जी ने उसे बताया होता हैं कि उसको कुछ जरूरी काम से रुकना पड़ गया हैं। अब वह अपने माता - पिता के साथ घर ही आने वाला है तुमसे मिलने के लिए। तो प्रियंवदा इस बात से बहुत खुश होती हैं। कुछ दिन बाद शास्त्री जी अपने परिवार के साथ अपने घर पहुॅंचते हैं। वहाॅं सारा गाॅंव ही प्रियंवदा के बोलने से खुश होता हैं। उधर प्रभात अपने परिवार के साथ गाॅंव जाने की तैयारी करता है। 
" उसकी आंखों में आज बस मेरा इंतजार होगा,
उसका दिल प्यार के इजहार को बेकरार होगा।
सज सॅंवर कर ना जाने कितनी बार खुद को आईने में निहारती होगी,
पर मैं जानता हूॅं कि उसके चेहरे पर नूर मेरे प्यार का होगा।"
             उस दिन प्रियंवदा सुबह से बहुत खुश होती हैं। उसकी नजरें प्रभात की राह देख रही होती हैं। वह बार - बार जाकर रास्ते की ओर देखती हैं। उसका ये इंतजार घर पर किसी से नहीं छुपता है। वह हर बार राह देखती हैं और मन ही मन कहती हैं।
"तेरी आने की राह पर निगाहें बिछाएं बैठी हूॅं,
दिल में इजहार की ख्वाहिशों का समंदर छिपाएं बैठी हूॅं।
आकर अपनी प्रियम का हाथ थाम भी लो प्रियतम,
ना जाने कब से तेरी दुल्हन बनने को बेकरार बैठी हूॅं।" 

और शाम होते - होते वे प्रियंवदा के घर पहुंच जाते है। और फिर..........

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