कुछ अनकहे अनसुने शब्द भाग - 12

                     ( भाग - 12 )

जैसे ही प्रभात अपने परिवार के साथ शास्त्री जी के घर पहुॅंचता हैं। तो वहाॅं उनका बहुत अच्छे से स्वागत सत्कार होता है। थोड़ी देर बाद प्रियंवदा आती हैं। आते ही सबसे पहले उसकी नजर प्रभात को ढूॅंढती है। प्रभात को देखते ही उसके चेहरे का रंग गुलाबी हो जाता है। उसके चेहरे के खिलते रंग को सभी महसूस करते हैं। उधर प्रभात की नजर भी उस पर से नहीं हटती है। मानों दोनों ने सबसे नजरें चुराकर आंखों - आंखों में ही सारी बातें कर ली हो। 

" उसके इतंजार में तरसती उसकी आखों ने,
उसकी राह तक, दिल ने लम्हा लम्हा  याद किया।
जो भी ख्वाहिशें बयाॅं करना चाहती थी वो लफ्जों में,
उसके दीदार को बेकरार निगाहों ने लफ्जों को दगा दे वो सब कह दिया।"

प्रियंवदा - 

" यूॅं आंखों - आंखों में जो बातें होती रहीं तो,
 होठों पर ठहर कर रह जाएंगे दिल के राज।
ना पढ़ यूॅं अपनी निगाहों से निगाहों को मेरी, 
मुझे लफ्जों में कहने ख्वाहिश है आज,
बन्द पलकों तले सुन, खामोशियाॅं गुनगुना रही हैं आज जिस पर, 
वो मेरी धड़कनों की लय हैं, तेरी धड़कनों का हैं साज। 

प्रभात -

" ये आंखें, ये जुल्फें, ये मुझे देख तेरे गालों का गुलाबी होना,
यूॅं छुप छुपकर सबकी नजरों से होठों पर मुस्कुराना तेरा।
बयाॅं करती है निगाहें, तेरी बेख्याली, तेरी बेसब्री, तेरा इश्क - ए - इजहार,
मेरी धड़कने सुन रही हैं तेज धड़कते दिल का धड़कना तेरा।"

उसी वक़्त शास्त्री जी प्रियंवदा के पास आते हैं। और प्रियंवदा का सबसे परिचय कराते हैं। प्रियंवदा बड़े आदर से प्रभात के माता - पिता को चरणस्पर्श करते हुए प्रणाम कहती हैं। प्रभात की माॅं उसे आशीर्वाद देते हुए अपने गले से लगा लेती हैं। फिर सभी लोग प्रियंवदा से बातें करते हैं। पर प्रभात उन्हें बातें करते देख रहा होता है, पर सुन नहीं पाता। वह प्रियंवदा को बातें करते हुए देखता है। तो उसे बहुत खुशी होती हैं। और उसके दिल में एक अरमान जगता है। काश कि वो भी प्रियंवदा की आवाज सुन पाता। उसकी आंखें नम हो जाती हैं। पर वो खुद को रोक लेता है। पर वहीं शास्त्री जी नजरों से प्रभात के भाव छिपते नहीं है। वे खड़े होते हैं। और सबसे कहते हैं कि-

शास्त्री जी - आप सब प्रियंवदा बेटी से बातें करें। मुझे भी हमारे प्रभात से मिले बहुत दिन हो गए हैं। मुझे भी जरा प्रभात से दो बातें करने दें। क्यों प्रभात चले बेटा अपने आंगन में जहाॅं बैठकर हम रोज बातें करते थे। (वे प्रभात का हाथ पकड़कर उसे उठाते हुए कहते हैं।) चलो प्रभात बगीचे के फूल तुम्हें याद कर रहे हैं। 

शास्त्री जी अंदर से दुखी होते हैं, कि इतना खुल कर बोलने वाला प्रभात आज कुछ ना सुन पाने की वजह से खामोश बैठा है। लेकिन वे समझदार थे। इसीलिए बोलते - बोलते वे प्रभात का हाथ पकड़कर उसे बाहर की ओर ले जाते हैं। और वहाॅं बैठे प्रभात के माता - पिता ये सब देखकर बहुत खुश होते हैं। कि यहाॅं सब उनके बेटे से कितना प्यार करते हैं। प्रभात की भावनाओं का भी कितना ख्याल रखते हैं। प्रभात की माॅं बाहर जाकर प्रभात से कहती हैं।

माॅं - ( वह एक कागज में लिखकर देती हैं ) प्रभात बेटा अगर तू कहे तो हम प्रियंवदा को तेरे बारे बताते हैं। प्रियंवदा को देखकर लग रहा है। वो तुझसे बहुत कुछ कहना चाहती हैं। ये सब कैसे होगा।

प्रभात - नहीं माॅं मैं खुद प्रियंवदा से बात करूॅंगा। और माॅं हम दोनों को एक दूसरे की बात समझने के लिए कभी भी शब्दों कि जरूरत थी ही नहीं।

शास्त्री जी - बहन जी आप फिक्र ना करें, सही कहता है प्रभात। इन्हें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। प्रभात सब कुछ सॅंभाल लेगा।( शास्त्री जी लिखकर देते हैं) प्रभात मैंने इतने दिनों से प्रियंवदा को तुम्हारा इंतजार करते देखा है। वह शायद अपने दिल में भावनाओं का एक समंदर समेट कर बैठी हैं। बहुत खुश हैं, मैं अपनी बेटी की सौगंध लेकर कहता हूॅं। हमने उसे अब तक तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहा हैं। पर मेरा दिल जानता है। जैसे तुम्हें उसके ना बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ा। वैसे ही उसे तुम्हारे ना सुनने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

प्रभात - शास्त्री जी ये जो कुछ भी आप दोनों मुझे बता रहे हैं। ये सब मैंने अभी उसकी आंखों में देखा है। माॅं अगर आपकी और शास्त्री जी की इजाजत हो तो मैं प्रियंवदा से अकेले में बात करना चाहता हूॅं।

शास्त्री जी - चलिए बहन जी अंदर चलकर हम प्रियंवदा को यहाॅं भेजते हैं।

माॅं - जी शास्त्री जी चलिए।

आखिर वो पल आ जाता है। जब प्रभात प्रियंवदा से मिलकर उसे अपने बारे में बताएगा। प्रभात की माॅं अंदर जाकर प्रियंवदा से कहती हैं।

माॅं - प्रियंवदा जाओ बेटा अब तुम और प्रभात बाहर बातें करो। हम बड़े जरा आगे की चर्चा करते हैं। ठीक है।

प्रियंवदा - जी माॅं जी, पापा मैं..

शास्त्री जी - हाॅं जाओ बेटा, अब आगे क्या, कैसे, कब करना हैं, शादी की तैयारियां कहाॅं करनी है। ये सब तो दो परिवार ही मिलकर तय करेंगे ना। तुम बच्चे बाहर बातें करों।

  प्रियंवदा को तो कब से इस पल का इंतज़ार था। वह बाहर आंगन की ओर चली जाती हैं। वहाॅं प्रभात बड़ी बेसब्री से अपनी प्रियम का इंतजार कर रहा होता है। प्रियंवदा प्रभात के सामने होती हैं। और दोनों एक दूसरे को देख मन ही मन कहते हैं।

प्रभात - 
" तेरी याद में हर पल एक साल जैसा था,
जी करता है जिंदगी का हर पल तेरे नाम कर दूॅं।

प्रियंवदा -
" मेरी खामोशियों ने तेरे नाम कई खत लिखे मेरे दिल पर,
जी करता है आज प्यार का हर लफ्ज़ तेरे दिल के नाम कर दूॅं।

प्रभात -
"दो कदम के इस फासले ने मीलों का सफर तय किया है,
तू अपनी ख्वाहिशों में सिमट कर आ, मैं तुझे अपनी बाहों में भर लूॅं।

प्रियंवदा -
"कई अरमान अंगड़ाइयाॅं लेते रहे मेरी तन्हाइयों में अक्सर,
जो तू कहे तो अपनी तन्हाइयों में तेरी शाम - ओ - सहर शामिल कर लूॅं।

प्रभात - 
" ना आने दें दो दिलों के दरमियां  लफ्जों को आज,
यूॅं ही खामोशियों को खामोशियों से गुफ्तगू करने दे।

प्रियंवदा -
"मैं जानती हूॅं तेरी खामोशी मेरी खामोशी पढ़ रही हैं मगर,
आज खामोशियों के दरमियाॅं इन फासलों को मुझे लफ्जों से मिटा लेने दे।

प्रभात - 
हमारे बीच लफ्जों की कहाॅं जगह हैं,

प्रियंवदा -
तुझसे मेरे प्यार का इजहार अधूरा है, बस यहीं एक वजह है।

प्रभात - 
लबों पर मुस्कान, फिर नैनों से नीर क्यों बहे,

प्रियंवदा - 
इनकी ख्वाहिश है, प्रभात एक बार प्यार से प्रियम कहे। 

प्रभात - प्रियम, 

प्रियंवदा - प्रभात।

प्रभात - कैसी हो प्रियम। 

प्रियंवदा - अच्छी हूॅं, तुम कैसे हो प्रभात। 

प्रभात बोलते हुए उसके होठों को पढ़ने का प्रयास करता है।

प्रियंवदा - देखो प्रभात अब तुम्हारी प्रियम बोल सकती हैं। 

प्रभात - प्रियम इससे पहले कि तुम मुझसे कुछ कहो, मुझे तुमसे कुछ कहना है। पहले तुम मेरी बात सुनो।

प्रियंवदा - बिल्कुल नहीं। पता हैं जब डॉक्टर ने अस्पताल में मुझसे कहा कि कल तुम पहली बार कुछ बोलोगी। तो मेरी एक ही इच्छा थी। कि काश तुम वहाॅं पर होते तो मैं सबसे पहले तुमसे बात करती। तुम्हें आवाज देती। तुम्हारा नाम लेती। पर तुम तो वहाॅं थे ही नहीं।

प्रभात को कुछ सुनाई नहीं देता है। वह बीच में ही बोल पड़ता हैं।

प्रभात - प्रियम मेरी बात सुनो, मुझे तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी हैं। मेरी ओर देखो और मेरी बात सुनो।

प्रियंवदा - नहीं प्रभात तुमने तो मुझसे अपने दिल की हर बात कही हैं। पर मैं सब कुछ सुनकर भी कभी कुछ नहीं कह पायी। मुझे बहुत कुछ कहना है। अपने दिल की हर बात तुमसे कहना चाहती हूॅं। मुझे मत रोको। क्या तुम मेरी बातें नहीं सुनना चाहते हो। तुमने तो अपने प्यार का इजहार एक नहीं कई बार किया हैं। पर मैं चाह कर भी तुम्हारे प्यार का जवाब ना दे सकी। 

प्रभात - ( वह ना सुन पाने की वजह से कुछ कह नहीं पा रहा था ) प्रियम एक बार मेरी बात तो सुनो कि मैं कहना क्या चाहता हूॅं। मुझे एक मौका तो दो।

  प्रियंवदा प्रभात का हाथ अपने हाथों में लेकर कहती हैं।

प्रियंवदा - मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती प्रभात, मेरे जिस जवाब का तुमने इतना इंतजार किया है। आज मैं वहीं तुमसे कहना चाहती हूॅं। ये फूल, ये कलियां, वो आसमाॅं, ये धरती, ये हवा, ये प्रकृति का कण - कण साक्षी हैं। कि मैंने तुम्हारा कितना इंतजार किया है। मैं कितनी बेकल थी। तुमसे मिलने को, तुम्हें देखने को, तुमसे दो पल बात करने के लिए, ये सब जानते हैं। मुझे तुमसे क्या कहना है, और इन दो चार दिनों में मैंने ना जाने कितनी बार इन्हें बताया हैं, कि जब प्रभात आएगा तो मैं ये कहूॅंगी, मैं वो कहूॅंगी, मैं ऐसे कहूॅंगी, अपने दिल की हर बात कहूॅंगी। क्या तुम अपने प्यार का जवाब मेरी आवाज में, मेरी जुबाॅं से नहीं सुनना चाहते।

इधर आओ प्रभात (वह प्रभात का हाथ पकड़कर तुलसी के पास के जाती हैं )  ये देखो तुलसी माता, इनके सामने तुमने कितनी बार मुझे कहा हैं, कि तुम मुझसे कितना प्यार करते हो। तब मैं मजबूर थी। कुछ नहीं कहा। पर अब जब मैं बिल्कुल ठीक हूॅं । तो मैं हर सुबह तुलसी पूजन करते समय माता रानी से बस तुम्हारे जल्दी आने प्रार्थना करती रही। ताकि तुम्हारे सामने अपना दिल निकाल कर रख सकूॅं।
तुम्हें वो सब बता सकूॅं, जो मैं कभी ना कह सकी।

प्रभात - (बहुत कोशिश करता है समझने की पर समझ नहीं पाता है। वह फिर कोशिश करता है। ) अच्छा एक बार मेरी बात सुन लो, फिर तुम्हें जो कहना है तुम कहना। मैं तुम्हें नहीं रोकूॅंगा। 

प्रियंवदा - ( प्रभात के दोनों हाथ थाम लेती हैं, उसकी आंखों में देखकर कहती हैं। ) प्रभात मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूॅं। ( वो अपनी पलकें झुका लेती हैं, और प्रभात उसकी तरफ देख समझ जाता है। कि वह अपने प्यार का इजहार कर रही हैं। )  वो भी तब से जब तुमने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया था। तब से मैंने हर रोज तुम्हारा ही सपना देखा है। तुम्हारा नाम लेकर जगी हूॅं, और तुम्हारे ख्यालों में ही सोई हूॅं। कई बार तुम्हारा दिल तोड़ने की कोशिश की, पर मैं जानती हूॅं, हर बार दर्द सिर्फ मुझे ही हुआ। तुमसे नफरत का नाटक करते हुए खुद से नफ़रत कर बैठी। जितनी बार तुम्हें अनदेखा किया। उतनी बार मुझे आइने में मुझमें तुम्हारा अक्स दिखा। जब - जब तुम्हें नाराजगी से देखा, तब - तब इन आंखों ने अश्क बहाए हैं। ये आंखें जी भर रोई हैं। जितनी बात इस प्यार को छुपाने की कोशिश की, उतनी ही बार तुमने सामने से आकर मेरी कोशिश को नाकाम किया। मैं हर बार तुम्हारे प्यार के सामने हार गई। पर आज मैं पूरी तरह से तुमसे अपने प्यार का इजहार करती हूॅं। एक नहीं कई बार कहना चाहती हूॅं। कि मैं तुमसे प्यार करती हूॅं, तुम्हारी जिन्दगी में शामिल होना चाहती हूॅं। तुम्हें अपनी जिंदगी बनाना चाहती हूॅं। प्रभात तुमने पूछा था ना, क्या तुम मुझसे शादी करोगी। आज मैं कहती हूॅं, कि हाॅं मैं तुमसे शादी करना चाहती हूॅं। हमकदम, हमसाया, हमसफ़र बनकर तुम्हारे साथ चलना चाहती हूॅं। अपने सारे सुख तुम्हें देकर, तुम्हारे दुःख साझा करना चाहती हूॅं। प्रभात अब मैं अपनी आगे की जिंदगी तुम्हारे नाम करती हूॅं। 

वो शब्दों में कह रही थी। प्रभात चेहरे के भावों को समझ रहा था। दोनों भावुक हो रहे थे। प्रभात ने प्रियंवदा को सीने से लगा लिया। दोनों उस एक पल में बहुत खुश थे। तभी प्रभात प्रियंवदा को खुद से दूर करता हुआ, अपने हाथों से उसके कंधे पकड़ते हुए कहता है।

प्रभात -
"कल जो शब्द कुछ अनकहे से थे,
आज वहीं शब्द अनसुने से हो गए।
बड़े बेसब्र थे तेरे इश्क ए इजहार को हम,
पर फिर हालात हम दोनों से खफा हो गए।
कैसे कहूॅं जो शब्द कभी तेरे अनकहे से थे,
वही शब्द आज मेरे लिए अनसुने से हो गए।
कल जो हमें चाह थी, वो तुम कह ना सकीं,
आज हम सुन नहीं सकते, और तुम सब आसानी से कह गए।"

 इतना कहते हुए प्रभात की आंखें नम हो जाती हैं।

प्रियंवदा - ये क्या कह रहे हो प्रभात, इसका क्या मतलब है।

प्रभात - मुझे नहीं पता प्रियम तुम मुझसे क्या पूछ रही हो। पर मैं कब से तुम्हें एक बात बताना चाहता हूॅं, तुम सुन ही नहीं रही हो। और जो तुमने मुझसे अभी कहा, मैं जानता हूॅं प्रियम, तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो, हमारे प्यार के लिए मुझे कुछ सुनने की और तुम्हें कुछ कहने आवश्यकता नहीं हैं। अभी तुमने जो अपने दिल की बात कही वो मेरे दिल की गहराइयों तक मुझे महसूस हुई हैं। तुम्हारा प्यार दिल से दिल तक नहीं, दिल से रूह तक का हैं। मैंने महसूस किया है।( प्रभात दूसरी ओर मुड़ते हुए) पर तुम्हारी आवाज मेरे कानों तक नहीं पहुॅंची। 

प्रियंवदा - ( प्रभात के सामने आकर ) तुम ठीक तो हो ना प्रभात। क्या हुआ। बताओ ना। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।

प्रभात - पहले की तरह इशारों में कहो ना प्रियम। मुझे तुम्हें सुनने या समझने के लिए शब्दों कि आदत नहीं है।

 प्रियंवदा वहीं बात इशारों में कहती हैं।

प्रभात - प्रियम अस्पताल से घर जाते समय मेरा एक्सिडेंट हो गया था। उस घटना में दो ट्रकों के टकराने से एक जोर का धमाका हुआ। उसी धमाके की वजह से मेरी सुनने की क्षमता चली गई। मैं सुन नहीं सकता।

प्रियंवदा ये सुनकर दुःखी हो जाती हैं। और कुछ देर दोनों खामोश हो जाते हैं। दोनों की आंखों में आंसू होते है। प्रभात खुद को सॅंभालते हुए कहता है।

प्रभात - प्रियंवदा

प्रियंवदा - ( इशारों में कहती हैं ) प्रियंवदा। प्रभात प्रियंवदा क्यों, तुमने मुझे प्रियंवदा कहा। प्रियम क्यों नहीं। 

प्रभात - क्योंकि मैं अब सुन नहीं सकता हूॅं। और मुझे नहीं लगता, कि अब हमारी शादी हो सकती है। तो प्रियम कहकर तुम पर अपना हक कैसे दिखाऊॅं। अब निर्णय तुम्हारा होगा। जो तुम चाहोगी वही होगा।

प्रियंवदा - ( इशारों में गुस्से से कहती हैं ) क्यों, शादी क्यों नहीं हो सकती है। इसलिए क्योंकि तुम सुन नहीं सकते। तुम हमेशा अपना फैसला सुनाते हो। कभी मुझसे नहीं पूछते कि मैं क्या चाहती हूॅं। कल भी तुमने अपना ही फैसला सुनाया। आज भी तुम ही फैसला सुनाना चाहते हो। मेरी भावनाओं का क्या, मेरे प्यार का क्या, कुछ नहीं। मुझे कोई फर्क नहीं तुम्हारे ना सुनने से। ये प्रियम सिर्फ और सिर्फ अपने प्रभात की हैं बस।

प्रभात -  मैं नहीं चाहता, कि तुम मेरी कमी को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाओ। जरा सोचो जब तुम दो पल मुझसे प्यार की बातें करोगी और मैं सुन नहीं पाऊॅंगा तब क्या होगा। जब तुम्हारी सहेलियाॅं ये कहेंगी कि प्रियंवदा का पति तो सुन नहीं सकता तब मुझे कैसा लगेगा। तुम्हारी पूरी जिन्दगी का सवाल है तुम समझती क्यों नहीं प्रियंवदा। इसलिए अब तुम्हें मुझे भूलना होगा। मान लो जैसे हम कभी मिले ही नहीं।

प्रियंवदा - (इशारों में गुस्सा करती हैं ) सबसे पहले तो तुम मुझे ये प्रियंवदा कहना बंद करो। ( प्रभात आश्चर्य से देखता हैं ) और मैं जानती हूॅं, तुम ये सब वहीं बाते कह रहे हो, जो कभी मैंने तुमसे कही थी। लेकिन तब तो तुम्हें मेरे ना बोलने से कोई ऐतराज नहीं था। वैसे ही आज मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मैं तुमसे प्यार करती हूॅं प्रभात। मैंने तुम्हें बहुत सताया हैं। मुझे माफ़ कर दो। पर ऐसा ना कहो। मैं नहीं रह सकती तुम्हारे बिना।

प्रभात - (मुस्कुराते हुए) मुझे मेरी प्रियम का जवाब पता था। वैसे एक बात और बताऊॅं। डॉक्टर का कहना है कि मैं कुछ समय बाद सुन सकता हूॅं। 

प्रियंवदा - (इशारों में कहती हैं ) अच्छा तो तुम मुझे सता रहे थे। 

प्रभात - (उदास स्वर में कहता हैं ) नहीं, पर मैं चाहता हूॅं। कि तुम एक बार सोच लो। होगा वही जो तुम चाहोगी। क्योंकि प्रियम मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। तुम मेरी वजह से बोलने के बाद भी इशारों में बात कर रही हों। 

प्रियंवदा - (इशारों में, प्रभात की ओर देखते हुए ) जो आवाज मेरा प्रभात नहीं सुन सकता। मेरे लिए उसके कोई मायने नहीं हैं। और वैसे भी हमारा प्यार खोमोशी से ही शुरू हुआ था। लगता है हमारे प्यार को शब्दों की ज़रूरत ही नहीं हैं। देखना प्रभात ये अनकही, अनसुनी सी डोर हमें हमेशा एक दूसरे से बाॅंधे रखेंगी। कितना खूबसूरत रिश्ता हैं हमारा। हम चुप रहे तो भी हमारे भाव बोलते हैं। जहाॅं लोग बातों से एक दूसरे को समझ नहीं पाते हैं। एक दूसरे का साथ निभा नहीं पाते हैं। वहीं हम दोनों बिन कुछ कहे, बिन कुछ सुने एक दूसरे को कितना समझते हैं, कितना प्यार करते हैं। 

प्रभात - हम आंखों से बातें करते हैं।

प्रियंवदा - और खामोशियाॅं समझते हैं

प्रभात - एक दिल की लय पर

प्रियंवदा - दूसरा दिल धड़कता है।

प्रभात - हम दोनों के बीच एक अदृश्य डोर हैं।

प्रियंवदा - कुछ अनकही, कुछ अनसुनी सी।

फिर दोनों मुस्कुराने लगते हैं। प्रभात एक कागज निकालता हैं। और दोनों उस पर एक - एक लाइन लिखते हैं।

प्रभात दो दिलों को जोड़ती हैं, एक अदृश्य डोर सी,
प्रियंवदा - कुछ अनकही सी, कुछ अनसुनी सी।
प्रभात - मैं एक खुली किताब बनकर रहूॅं तेरे लिए,
प्रियंवदा - मैं उसमें प्यार के नगमें लिखूॅं तेरे लिए।
प्रभात - दोस्त कहूॅं, हमसफ़र कहूॅं या कहूॅं हमराज तुझे,
प्रियंवदा - मैं हमसफ़र हूॅं, हमकदम भी, पर प्यार से कह प्रियम मुझे।

प्रभात और प्रियंवदा दोनों दुनिया से बेखबर एक दूसरे से बाते करते हुए एक अलग दुनिया में होते हैं।

  उधर प्रियंवदा को प्रभात के लिए इशारों में बात करता देख और प्रभात को हर बात का जवाब देता देख दोनों के परिवार भाव - विभोर हो जाते हैं। और कहते हैं कोई कैसे किसी से इतना प्यार कर सकता है। इन्हें ईश्वर ने एक दूसरे के लिए ही बनाया है। 

और इस तरह दोनों की कुछ अनकही, कुछ अनसुनी प्रेम कहानी एक दूसरे को पाकर पूरी होती है।








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