कुछ अन्जाना -सा एहसास हैं आजकल , ना जाने क्यूँ ,
अक्सर खोया -खोया सा रहता हूँ।
मुस्कुराना तो चाहता हूँ, पर ना जाने क्यूँ ,
अक्सर पलकों पर रुकें आँसू पोंछा करता हूँ।
सुबह नींद से जागते ही, ना जाने क्यूँ ,
पल भर किसी को निहारने की इन आँखों की ख्वाहिश होती हैं।
मेरी रात तो ख्वाब सजाना चाहती हैं ,पर ना जाने क्यूँ ,
किसी की धड़कनों को महसूस करने की इस दिल की गुजारिश होती हैं।
घर लौटते समय हर शाम ,ना जाने क्यूँ ,
मेरे कदम अक्सर मैयखाने की ओर मुड़ जाते हैं।
भर तो लेता हूँ दो -तीन प्याले मय के ,पर ना जाने क्यूँ ,
होंठों तक आते -आते प्याले अक्सर हाथों से छूट जाते हैं।
जानता हूँ घर पर वो नहीं मेरा इंतज़ार करने को ,पर ना जाने क्यूँ ,
शायद वो लौट आई हों मेरे लिए पल -पल ये महसूस करता हूँ।
दूर से ही देख लेता हूँ दरवाजे पर लगें ताले को,पर ना जाने क्यूँ ,
वो मुस्कुराती हुई आकर दरवाजा खोलें ये सोच कर दरवाज़े पर आहट किया करता हूँ।
चारों तरफ घर में ख़ामोशी ही ख़ामोशी हैं फिर भी ,पर ना जाने क्यूँ ,
ना चाहते हुए भी होंठों पर उसका नाम आते ही उसे पुकारा करता हूँ।
सब कुछ तो हैं आज मेरे पास ,पर ना जाने क्यूँ ,
खुद को अक्सर अँधेरे और तन्हाई में समेट लिया करता हूँ।
उसके रूठ जाने के बाद मर जाना चाहता हूँ पर ना जाने क्यूँ ,
ये साँसों की मजबूरी हैं जो ना चाहते हुए भी जिए जा रहा हूँ।
उसने कहा था जाते वक़्त मुझे याद ना करना कभी,पर ना जाने क्यूँ ,
बस तब से उसे भुलाने की नाक़ाम -सी कोशिश किए जा रहा हूँ।
खुश रहने के हज़ारों बहाने ढूँढा करता हूँ ,पर ना जाने क्यूँ ,
हर तरफ उदासी हैं और मुस्कुराने के बहाने कम हैं।
मुझे कभी दिल की धड़कन तक नहीं सुनायी दी ,पर ना जाने क्यूँ ,
आज सुना जब दिल ने चुपके से कहा, ये और कुछ नहीं तुझे उससे बिछुड़न का गम हैं।

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