तेरी बिछुड़न (भाग - 1)



कुछ अन्जाना -सा एहसास हैं आजकल , ना जाने क्यूँ ,
अक्सर खोया -खोया सा रहता हूँ। 
मुस्कुराना तो चाहता हूँ, पर ना जाने क्यूँ ,
अक्सर पलकों पर रुकें आँसू पोंछा करता हूँ। 
सुबह नींद से जागते ही, ना जाने क्यूँ ,
पल भर किसी को निहारने की इन आँखों की ख्वाहिश होती हैं। 
मेरी रात तो ख्वाब सजाना चाहती  हैं ,पर ना जाने क्यूँ ,
किसी की धड़कनों को महसूस करने की इस दिल की गुजारिश होती हैं। 
घर लौटते समय हर शाम ,ना जाने क्यूँ ,
मेरे कदम अक्सर मैयखाने की ओर मुड़ जाते हैं। 
भर तो लेता हूँ  दो -तीन प्याले मय के ,पर ना जाने क्यूँ ,
होंठों तक आते -आते प्याले अक्सर हाथों से छूट जाते हैं। 
जानता हूँ घर पर वो नहीं मेरा इंतज़ार करने को ,पर ना जाने क्यूँ ,
शायद वो लौट आई हों मेरे लिए पल -पल ये महसूस करता हूँ। 
दूर से ही देख लेता हूँ दरवाजे पर लगें ताले को,पर ना जाने क्यूँ ,
वो मुस्कुराती हुई आकर दरवाजा खोलें ये सोच कर दरवाज़े पर आहट किया करता हूँ। 
चारों तरफ घर में ख़ामोशी ही ख़ामोशी हैं फिर भी ,पर ना जाने क्यूँ ,
 ना चाहते हुए भी होंठों पर उसका नाम आते ही उसे पुकारा करता हूँ। 
सब कुछ तो हैं आज मेरे पास ,पर ना जाने क्यूँ ,
खुद को अक्सर अँधेरे और तन्हाई में समेट लिया करता हूँ। 
उसके रूठ जाने के बाद मर जाना चाहता हूँ पर ना जाने क्यूँ ,
ये साँसों की मजबूरी हैं जो ना चाहते हुए भी जिए जा रहा हूँ। 
उसने कहा था जाते वक़्त मुझे याद ना करना कभी,पर ना जाने क्यूँ ,
बस तब से उसे भुलाने की नाक़ाम -सी कोशिश किए जा रहा हूँ। 
खुश रहने के हज़ारों बहाने ढूँढा करता हूँ ,पर ना जाने क्यूँ ,
हर तरफ उदासी हैं और मुस्कुराने के बहाने कम हैं। 
मुझे कभी दिल की धड़कन तक नहीं सुनायी दी ,पर ना जाने क्यूँ ,
आज सुना जब दिल ने चुपके से कहा, ये और कुछ नहीं तुझे उससे बिछुड़न का गम हैं। 

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