शिव के भस्मधारण, रुद्राक्ष धारण, बेल पत्र, पार्थिव शिवलिंग पूजन तथा शिव के विभिन्न रहस्यों का वर्णन

शिव के भस्मधारण, रुद्राक्ष धारण, बेल पत्र, पार्थिव शिवलिंग पूजन तथा शिव के विभिन्न रहस्यों का वर्णन

परम संत हे सूत जी, पुण्य कर्म आचार ।
भस्म रमें शिव अंग क्यों, कहें भस्म का सार।।(१)

महिमा भस्म, शिवाक्ष की,बेल पत्र गुण गान।
रीति पार्थिव पूजन की, रुद्र रहस्य बखान।।(२)

कहे सूत जी मुनि जनों, क्या हैं सुने विभूत।
पूर्व काल में शिव कहें,भस्म सार अधिभूत।।(३)

नाम जाप शिव जाह्नवी , भस्म यमुना समान।
हैं रुद्राक्ष सरस्वती, संगम मोक्षण मान।।(४)

डूब त्रिवेणी में तरें, करें जो भक्त स्नान।
यही पुण्य पथ मोक्ष का, जप तप भक्ति विधान।।(५)

महा काल हर रुद्र ने, स्वयं रूप आधेय। कर प्रपंच सब दग्ध वे,पाय भस्मआग्नेय।।(६)

अंतर पावक लब्ध है, भस्म तत्व आधार।
भस्म रमा शिव अंग में, पाए जग का सार।।(७)

जब भभूत लेपन किए, अंग रत्न सम रूप।
पंच तत्व हर अंग में,शोभित नाथ अनूप।। (८)

वायु सार मुख रूप में, नीर तत्व कटि भाग,
केश बने नभ अंश से, हृदय मूल में आग।(९)

घुटना पृथ्वी रूप में, नख - शिख अनुपम तत्व।
मानव मंगल हेतु ही, शंकर गात महत्व।।(१०)

शिवजी बोले शक्ति से, रूद्र अक्ष का गान।
दरस, स्पर्श, जप मात्र से, पाप हरें सब जान।।(११)

तन तप तन्मय बरस से, मन भी समाधि लीन।
विचलित अंतस ज्यों हुआ, नैन खुले तल्लीन।।(१२)

मेरे साधक नैन से, जो थे पलकें मूॅंद।
बने नीर ढल भूमि पर, शुभ शिवाक्ष दृग बूॅंद।।(१३)

भक्त कृपा के भाव से, करके स्थावर नीर।
बाॅंट दिए हरि भक्त में, हरने सबकी पीर।।(१४)

वृहत आमलक तुल्य या, गुंजा सम आकार।
चाहे छोटा बेर सा, मोक्षण विविध प्रकार।।(१५)

भोग, मोक्ष की प्राप्ति का, एक शिवाक्ष उपाय।
गौरी - शंकर भक्त भी, धारण कर सुख पाय।।(१६)

आदर पूर्वक सब सुने, बिल्व वृक्ष माहात्म्य।
बेल पत्र प्रभु रूप हैं, शिवजी सम परमात्म्य ।।(१७)

पुण्य तीर्थ त्रय लोक के, बिल्व पत्र के मूल।
करें मनुज शिव लिंग में, अर्चन विधि अनुकूल।।(१८)

बिल्व मूल के पास जो,जल से सींचे भाल।
तीर्थ स्नान सम पुण्य हो, भरें बिल्व का थाल।।(१९)

पूजे सुगंध पुष्प से,रखे जला कर दीप।
भोजन दे शिव भक्त को,पादप बिल्व समीप।।(२०)

शाखा थामें हाथ से, पल्लव नये उतार।
पूजा करके बेल की, हो भव सागर पार।।(२१)

पावन माटी यत्न से, रखकर पवित्र स्थान।
मत्सा करके शुद्ध फिर, निर्मल जल से सान।।(२२)

वैदिक मंत्रों से करें,पार्थिव का निर्माण।
पूजे श्रद्धा भाव से, शंभू दें नित त्राण।।(२३)

शिव के आठों नाम से, कर लें लिंग विधान।
सुख संतति बढ़ती रहे, मिलें स्वयं शिव मान।।(२४)

हर से ॐ हराय नमः,प्रथम नाम का जाप।
माटी पार्थिव लिंग की,जपकर लाना आप।।(२५)

महेश्वराय नमः जपे, लिंग रूप निर्माण।
ॐ शम्भवे नमः, स्थापित लिंग में प्राण।।(२६)

ॐ शूलपाणये नमः, शिव आह्वाहन मंत्र।
पिनाकधृषे नमः जपे, पंचामृत अभिमंत्र।।(२७)

ॐ नमः शिवाय जपें, पार्थिव पूजन पूर्ण।
ॐ पशुपतये नमः से, भक्ति भाव परिपूर्ण ।।(२८)

ॐ महादेवाय नमः, मंत्र विसर्जन रीत।
करें षडक्षर मंत्र से, अंग स्थापन विनीत।।(२९)

अक्षत, पुष्प, शिवाक्ष ले, जपना शिव का नाम।
बेल पत्र शिव चरण में, कर साष्टांग प्रणाम।।(३०)

पावन पुनीत भाव से, कर प्रदक्षिणा आप। 
देवेश्वर शिव स्तुति करें, मधुर कंठ से जाप ।।(३१)

निराकार साकार भी,शिव शंकर ओंकार,
निर्गुण प्रभु शिव लिंग में, दरस रूप साकार।(३२)

दो भार्या हैं,आठ सुत,सात परम शिव शिष्य।
बुद्ध रूप शिव आप हैं, पालि ग्रंथ उल्लेख्य।।(३३)

शिव आदि और अंत हैं,सतयुग से कलि काल।
तीन लोक जड़ जीव सब, शरण तेरी त्रिकाल।।(३४)

हेमा आर्या "शिल्पी"
अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड)
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित 

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